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लाल बहादुर शास्त्री की 114वीं जयंती आज, ईमानदारी और सादगी की मिसाल थे पूर्व प्रधानमंत्री

जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की आज 114वीं जयंती है. शास्त्री जी के परिचय की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसे ही शास्त्री जी की ईमानदारी और सादगी से हर कोई वाकिफ है. लालबहादुर जी ने अपना जीवन बेहद सादगी से जिया. आज शास्त्री जी के जन्मदिन पर हम आपको उनके जीवन के सरलता, ईमानदारी और सादगी से भरे कुछ अनकहे किस्से सुनाने जा रहे हैं. जो आपने शायद ही कहीं सुने हो.

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  • Last Updated: October 2, 2017 02:28:16 IST
नई दिल्ली. जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की आज 114वीं जयंती है. शास्त्री जी के परिचय की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसे ही शास्त्री जी की ईमानदारी और सादगी से हर कोई वाकिफ है. लालबहादुर जी ने अपना जीवन बेहद सादगी से जिया. आज शास्त्री जी के जन्मदिन पर हम आपको उनके जीवन के सरलता, ईमानदारी और सादगी से भरे कुछ अनकहे किस्से सुनाने जा रहे हैं. जो आपने शायद ही कहीं सुने हो.
 
1. लालबहादुर शास्त्री इतने र्इमानदार थे कि उन्‍होंने कभी भी प्रधानमंत्री के तौर पर उन्‍हें मिली हुई गाड़ी का निजी काम के लिए इस्‍तेमाल नहीं किया.
 
2. कहा जाता है शास्त्री जी एक बार भुनवेश्वर स्थित एक कपड़े के शोरूम में गए. शोरूम में लगी साड़ियां देखकर लालबहादुर जी ने कहा कि साड़िया बहुत सुंदर है इनकी कीमत क्या है? शोरूम के मालिक ने उनका आदर करते हुए कहा कि आप तो प्रधानमंत्री हैं ये साड़ी में आपको उपहार में दे दूंगा. शास्त्री जी ने बड़ी सादगी से उत्तर देते हुए कहा कि मेरी जितनी हैसियत है उतनी की ही मैं साड़ी खरीदूंगा लेकिन भेंट नहीं लूंगा.
 
3. एक बार जब लाल बहादुर  रेलमंत्री थे तो वे जनता से मिलने काशी गए थे. तब एक व्यक्ति ने आकर सहज लहजे में कहा कि आपका कुर्ता फटा हुआ है. इस पर उन्होंने ने कहा कि गरीब का बेटा हूं. ऐसे रहूंगा तो गरीब का दर्द समझ सकूंगा.
 
 
4. ऐसा नहीं है कि शास्त्री जी पहले ऐसे नहीं थे. बताया जाता है कि शास्त्री जी एक बार अपने बचपन में गांव में मेला देखने अपने दोस्तों के साथ गए. लेकिन वापस लौटते वक्त उनकी जेब में नाव के किराए के लिए पैसे नहीं थे. वह वहीं रुक गए और दोस्तों से बोले कि वह थोड़ी देर बाद आएंगे. वह नहीं चाहते थे कि दोस्त उनका किराया दें. उसके दोस्त नाव से चले गए तो उनके जाने के बाद वह नदी में उतर गए और तैर कर अपने घर पहुंचे.
 
5. लोग शास्त्री जी की मिसाल ईमानदारी के लिए कई जन्मों तक याद रखेंगे. क्योंकि वो इतने ईमानदार थे कि एक बार उन्होंने अपने बेटे के गलत तरीके से प्रमोशन को रद्द करवा दिया था. 
 

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